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कलयुग अप्रैल 16, 2010

Posted by अतुल प्रकाश त्रिवेदी in Uncategorized.
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कलयुग – मालूम नहीं युगों के नामकरण के पीछे क्या रहा था . पर कल – यानि एक पर्याय यन्त्र . यानि औजार . बहुत आगे जाएँ तो मशीन . आजकल गैजेट शब्द का इस्तेमाल हो रहा है . क्या कहें इसे हम हिंदी में ? कुछ लोग तो अब गैजेट्स को व्यक्तिगत सजावट की सामग्री के तौर पर भी  रखने लगे हैं . बहुत फायदा है इनका . हाथ पैर कम चलाने पड़ते हैं. बेतार के यन्त्र के लिए अब न पंक्ति में लगना पड़ता है . न रात की दरों का इन्तेजार. डाक टिकट तो अब शायद उपयोग की कम संग्रह और विमोचन की वस्तु हो गएँ है. बहुत दिनों से लोगों को थूक लगाने की गन्दी आदत से भी छुटकारा मिल गया है . हाथ  पहले लिखने के लिए थे . अब टाइपिंग में प्रयोग आतें हैं . हालांकि बहुत से अफसर अपनी ईमेल भी अपने स्टेनो से ही अब भी टाइप करवा रहे हैं . अंगूठे और ऊँगली तो जैसे मोबाइल से चिपके रहते हैं . वैसे प्रायवेसी भी खत्म हो गयी है . अब आप बाज़ार में , सफ़र करते हुए पति – पत्नी , माँ और बेटियों , प्रेमी और प्रेमिका के संवाद सुन सकते हैं . और डोन, नेता , अभिनेता , पत्रकार , अफसर के संवाद भी कभी कभी टी वी वाले सुना देते हैं . और ट्विट्टर की चहचहाहट में तो आप बहुत कुछ सुन रहें होंगे इन दिनों .
कलयुग में यंत्रों ने हम सब पर कब्ज़ा कर लिया है . अब लोग टहलना , दौड़ना , कूदना , नौकायन सब यंत्रों पर ही कर लेते हैं . इसी लिए अब कविता से यंत्रों का शोर ज्यादा , कोयल , गुल , तितलियाँ , ख़ुश्बू कम नज़र आतीं हैं .
कभी कभी पढ़ने में आता है . शरीर के अंगो  को भी बदल दिया जा सकेगा . दिल के बदले शायद दिल देना संभव हो . पर कुछ लोगों को तो काम के बदले अनाज ही मिलेगा . कलयुग में मनुष्य एक यन्त्र हो जा रहा है . यत्र-तत्र-सर्वत्र .

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